प्रकाशित: 27 नवम्बर 2012

हमारे संवाददाता

नई दिल्ली। यूपीए दो की 72 सदस्यीय कैबिनेट के गठन में भारत की वर्तमान सामाजिक संरचना को पूरी तरह दरकिनार किया गया है। देश में एकमात्र सर्वाधिक जनसंख्या 21 करोड़ वाले यादव समुदाय का एक भी प्रतिनिधि शामिल नहीं किया गया है।

यह यादवों के साथ न केवल अन्याय है बल्कि सामाजिक असंतुलन को भी दर्शाता है। राजनीतिक रूप से सर्वाधिक योगदान देने वाले इस समुदाय के लोगों को प्रतिनिधित्व दिए जाने के लिए तत्काल मंत्रिमंडल का विस्तार या फेरबदल करने की जरूरत है क्योंकि इस समाज के आम लोग स्वयं को केंद्र की सत्ता में सहभागी नहीं बनाए जाने से उपेक्षित महसूस करने लगे हैं। जाहिर है इसका सीधा असर कांग्रेस के राजनीतिक आधार पर भी पड़ता दिखता है।

यह विचार आल यादव्स वैलफेयर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एचपी यादव ने नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में व्यक्त किया। उनके अनुसार कांग्रेस पार्टी के सांसद अरुण सुभाष यादव जो मध्य प्रदेश से आते हैं जिन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था लेकिन उन्हें पार्टी संगठन में सचिव बनाए जाने के नाम पर जुलाई 2011 में हटा दिया गया। अगर पार्टी की आवश्यकताओं के अनुरूप उन्हें हटाया गया तो अन्य यादव सांसद भी शामिल किया जाना तर्पसंगत होता। उन्होंने ध्यान दिलाया कि हालांकि देश की पहली 14 सदस्यीय कैबिनेट जो पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में गठित हुई थी, में भी इस तरह की विसंगति थी जिसमें भी यादव सांसद को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया था जबकि दो दलित व अपेक्षित रूप से मुस्लिम प्रतिनिधि के साथ-साथ ईसाई समुदाय से भी मंत्री बनाए गए थे।

ऐसा लगता है आजादी से पूर्व से ही यादवों के योगदान को नजरंदाज करने की एक सोची-समझी कोशिश होती रहती है। एक बार फिर केंद्र सरकार की कैबिनेट में कोई भी यादव सांसद मंत्री नहीं बनाए गए हैं।

हालांकि अगर देखा जाए तो वर्तमान 15वीं लोकसभा में ही विभिन्न राज्यों से कांग्रेस पार्टी के आधा दर्जन से अधिक सांसद जीत कर आए हैं। इनमें कई तो तीन बार या उससे भी अधिक समय से लगातार विजयी हो रहे हैं लेकिन जनता में उनकी इतनी मजबूत पैठ को भी दरकिनार किया गया है।

एक सवाल के जवाब में उनका कहना था कि हम किसी भी खास सांसद या राजनेता की वकालत नहीं करते बल्कि देश की 20 प्रतिशत आबादी वाली यादव जाति के आम जनमानस को भी केंद्र की सत्ता में सहभागी बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका दावा है कि इस समाज के लोग राजनीतिक रूप से केवल उत्तर प्रदेश व बिहार ही नहीं बल्कि केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली में सशक्त भूमिका अदा करते हैं। इन राज्यों में जहां अधिकतर संसदीय क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका में हैं वहीं राजधानी के पास सटे हरियामा जैसे राज्य में तो दक्षिण हरियाणा से 10 में से दो सांसद व 20 से अधिक एमएलए के भाग्य का निर्णय यादव समाज के मतदाता ही करते हैं और हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि इन राज्यों में परम्परागत तरीके से यादव मतदाता कांग्रेस के समर्थक रहे हैं अन्यथा आंध्र प्रदेश सिकंदरबाद से अंजन कुमार यादव, तमिलनाडु से केएस अलागिरी, गुजरात से विक्रम भी अर्जन भाई मादाम व हरियाणा से राव इन्द्रजीत सिंह जैसे कांग्रेसी सांसद लगातार विजयी होकर लोकसभा नहीं पहुंचते। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि ऐसे रिकार्ड के बावजूद कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन में इस जाति के सांसदों में से एक को भी मंत्रिमंडल में शामिल करने के लायक नहीं समझा गया।

Original Source: Vir Arjun

 

Leave a reply